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सही स्थिति में रखी मूर्ति या चित्र, शुद्ध मंत्रोच्चारण और सच्ची श्रद्धा से की गई पूजा ही फलदायक होती है। मूर्ति की स्थिति में छोटी-सी भी त्रुटि नकारात्मक या नपुंसक ऊर्जा उत्पन्न कर सकती है।
प्रत्येक घर में ऊर्जा के क्षेत्र होते हैं। वास्तु के अनुसार कमरों की सही स्थिति, मुख्य द्वार पर स्वस्तिक एवं गणेशजी की प्रामाणिक मूर्ति, और पवित्र संख्याओं का उपयोग घर में सकारात्मक वातावरण बनाता है।
प्रत्येक अमावस्या को तर्पण, प्रतिदिन पीपल वृक्ष को जल, और श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त भोजन — इन उपायों से पितर दोष शांत होता है और परिवार में अज्ञात कारणों से होने वाले कष्ट दूर होते हैं।
देवताओं के सामने केवल घी का दीपक जलाएँ। बाँस रहित अगरबत्ती या धूप भी उचित है।
रविवार, महिलाओं की अशुद्ध अवस्था, प्रसव और मृत्यु को छोड़कर प्रतिदिन तुलसी को जल और पूजा करें।
घर के सबसे बड़े सदस्य को प्रत्येक अमावस्या और श्राद्ध पक्ष में पितरों का तर्पण अवश्य करना चाहिए।
जल में कच्चा दूध, काला तिल, जौ और पुष्प मिलाएँ। "ओम विष्णवे नमः" का तीन बार उच्चारण करते हुए पीपल की जड़ में अर्पित करें।
धूप, दीपक और हवन केवल ताँबे, पीतल या मिट्टी के पात्र में ही करें — लोहे के पात्र में कदापि नहीं।
दर्शन के पश्चात् सामने खड़े होकर ईश्वर का ध्यान करते हुए दक्षिणावर्त तीन या पाँच बार घूमते हुए परिक्रमा करें। मूर्ति के चारों ओर घूमने से भगवान की मूर्ति को बंधन लगता है।
तेल स्नान से पहले लगाना चाहिए — स्नान के बाद तेल लगाने से शरीर अशुद्ध हो जाता है।
तेल का दीपक और तेल सिंदूर केवल भैरव, शनि, राहु और केतु के लिए है — हनुमान, गणेश या विष्णु के किसी भी स्वरूप पर नहीं।
बाँस को "वंश-नाशक" कहा गया है और इसे जलाना अशुभ माना जाता है। इसके स्थान पर गूगल/धूप या बाँस-रहित अगरबत्ती या घी का दीपक उत्तम है।
देवताओं पर और मिठाइयों पर चाँदी का वर्क लगाना सर्वथा वर्जित है। इससे गंभीर बीमारियाँ होने की प्रबल संभावना रहती है।
शास्त्रों में नील को गाय के रक्त के समान माना गया है। सफेदी के लिए टिनोपॉल का उपयोग करें।
इस पाठ में बार-बार हनुमानजी को सीताराम की दुहाई दी गई है, जिससे हनुमानजी को ब्रह्मफाँस लगती है। हनुमानजी के भक्तों को यह पाठ कदापि नहीं करना चाहिए।
जो व्यक्ति देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, उन्हें हींग का प्रयोग नहीं करना चाहिए — यह देवी भागवत में प्रमाणित है।
लोहे के बर्तन में धूप, दीपक और हवन करने से चुंबकीय शक्ति नष्ट हो जाती है और प्रदूषण बढ़ता है।
घर के सबसे बड़े सदस्य को प्रत्येक अमावस्या को तर्पण अवश्य करना चाहिए। उत्तर दिशा की ओर मुँह कर, हाथ ऊपर उठाकर तीन पीढ़ियों के पितरों को याद करें और आशीर्वाद की कामना करें।
प्रतिदिन (रविवार छोड़कर) पीतल या चाँदी के लोटे में जल, कच्चा दूध, काला तिल, जौ और पुष्प मिलाकर, "ओम विष्णवे नमः" का तीन बार उच्चारण करते हुए पीपल वृक्ष की जड़ में अर्पित करें।
श्राद्ध पक्ष के पंद्रह दिनों में पितरों के निमित्त प्रत्येक तिथि पर भोजन अवश्य करवाएँ। सर्वपितृ अमावस्या को सभी पितरों के निमित्त भोजन बनाकर एक आदमी का भोजन पितरों के नाम से जल छोड़कर गाय को खिलाएँ।
एक बड़े पात्र (परात) में पानी, दूध, काला तिल, जौ, पुष्प और कुशा डालें। अँगुलियों में कुशा की अँगूठी पहनकर, प्रत्येक पितर के लिए तीन-तीन अंजलि पानी से भरकर दाहिने हाथ के अँगूठे के पास से छोड़ें। माता-पिता, दादा-दादी और परदादा-परदादी के लिए तर्पण करें।