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हमारा उद्देश्य

परंपराओं को जीवित रखना

सही पूजा-पद्धति के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करना और प्रत्येक घर तक सकारात्मक ऊर्जा पहुँचाना, ताकि जीवन में शांति, सुख और समृद्धि बनी रहे।
सनातन धर्म की पूजा-पद्धतियों की शुद्धता और प्रामाणिकता को बनाए रखना।
हमारे पवित्र शास्त्रों में निहित कालातीत ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना।
घर-परिवार में शांति, समृद्धि और खुशहाली का वातावरण बनाने हेतु मार्गदर्शन प्रदान करना।
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पूज्य रामदास जी महाराज

रामदास जी महाराज ने अनेक शास्त्रों, पुराणों और पवित्र ग्रंथों के अध्ययन में अनेक वर्ष व्यतीत किए हैं। अपने आध्यात्मिक अनुभव और सनातन ज्ञान की गहरी समझ के माध्यम से वे समाज को प्रामाणिक उपासना पद्धतियों और सकारात्मक जीवन की ओर मार्गदर्शन करना चाहते हैं।

उनका उद्देश्य सनातन धर्म के सच्चे सिद्धांतों का संरक्षण करना, आध्यात्मिक जागरूकता फैलाना और उचित उपासना, मंत्रों और शास्त्र ज्ञान के द्वारा लोगों को शांति, समृद्धि और सुख प्राप्त करने में सहायता करना है।
Puja

सही पूजा के तीन आधार

आस्था भक्ति को मजबूत करती है। मंत्र आध्यात्मिक संबंध स्थापित करते हैं। सही मूर्ति का स्वरूप यह सुनिश्चित करता है कि पूजा विधिवत हो। ये तीनों स्तंभ मिलकर सही पूजा की नींव बनाते हैं।
बिजली की धारा की तरह — सच्ची श्रद्धा के बिना आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह नहीं होता।
तार की तरह — ऊर्जा को सही स्थान तक पहुँचाने के लिए मंत्रों का सही उच्चारण और सही क्रम बहुत महत्वपूर्ण है।
उपकरण की तरह — पूजा के लिए मूर्ति का स्वरूप प्रामाणिक होना चाहिए और उसे शास्त्रों के अनुसार सही स्थान पर स्थापित किया जाना चाहिए।
एक सुखी जीवन के लिए

शांति के तीन उपाय

जीवन के दुखों को कम करने और सुख, शांति तथा सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए इन तीन मुख्य कारणों को समझें और उनका समाधान करें।
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Correct Puja Paddhati

सही पूजा पद्धति

सही स्थिति में रखी मूर्ति या चित्र, शुद्ध मंत्रोच्चारण और सच्ची श्रद्धा से की गई पूजा ही फलदायक होती है। मूर्ति की स्थिति में छोटी-सी भी त्रुटि नकारात्मक या नपुंसक ऊर्जा उत्पन्न कर सकती है।

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Vastu Dosh Nivaran

वास्तु दोष निवारण

प्रत्येक घर में ऊर्जा के क्षेत्र होते हैं। वास्तु के अनुसार कमरों की सही स्थिति, मुख्य द्वार पर स्वस्तिक एवं गणेशजी की प्रामाणिक मूर्ति, और पवित्र संख्याओं का उपयोग घर में सकारात्मक वातावरण बनाता है।

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Pitar Dosh Nivaran

पितर दोष निवारण

प्रत्येक अमावस्या को तर्पण, प्रतिदिन पीपल वृक्ष को जल, और श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त भोजन — इन उपायों से पितर दोष शांत होता है और परिवार में अज्ञात कारणों से होने वाले कष्ट दूर होते हैं।

शास्त्रीय निर्देश

क्या करें – क्या न करें

प्राचीन शास्त्रों पर आधारित — दैनिक पूजा में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने के व्यावहारिक निर्देश
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✅ क्या करें

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गाय के घी का दीपक जलाएँ

देवताओं के सामने केवल घी का दीपक जलाएँ। बाँस रहित अगरबत्ती या धूप भी उचित है।

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तुलसी को प्रतिदिन जल दें

रविवार, महिलाओं की अशुद्ध अवस्था, प्रसव और मृत्यु को छोड़कर प्रतिदिन तुलसी को जल और पूजा करें।

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प्रत्येक अमावस्या को तर्पण करें

घर के सबसे बड़े सदस्य को प्रत्येक अमावस्या और श्राद्ध पक्ष में पितरों का तर्पण अवश्य करना चाहिए।

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पीपल वृक्ष को प्रतिदिन जल दें

जल में कच्चा दूध, काला तिल, जौ और पुष्प मिलाएँ। "ओम विष्णवे नमः" का तीन बार उच्चारण करते हुए पीपल की जड़ में अर्पित करें।

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ताँबे, पीतल या मिट्टी के बर्तन उपयोग करें

धूप, दीपक और हवन केवल ताँबे, पीतल या मिट्टी के पात्र में ही करें — लोहे के पात्र में कदापि नहीं।

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परिक्रमा सही तरीके से करें

दर्शन के पश्चात् सामने खड़े होकर ईश्वर का ध्यान करते हुए दक्षिणावर्त तीन या पाँच बार घूमते हुए परिक्रमा करें। मूर्ति के चारों ओर घूमने से भगवान की मूर्ति को बंधन लगता है।

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स्नान से पूर्व तेल लगाएँ

तेल स्नान से पहले लगाना चाहिए — स्नान के बाद तेल लगाने से शरीर अशुद्ध हो जाता है।

❌ क्या न करें

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सकारात्मक देवताओं पर तेल का दीपक न जलाएँ

तेल का दीपक और तेल सिंदूर केवल भैरव, शनि, राहु और केतु के लिए है — हनुमान, गणेश या विष्णु के किसी भी स्वरूप पर नहीं।

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बाँस की डंडी वाली अगरबत्ती न जलाएँ

बाँस को "वंश-नाशक" कहा गया है और इसे जलाना अशुभ माना जाता है। इसके स्थान पर गूगल/धूप या बाँस-रहित अगरबत्ती या घी का दीपक उत्तम है।

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चाँदी का वर्क न चढ़ाएँ और न खाएँ

देवताओं पर और मिठाइयों पर चाँदी का वर्क लगाना सर्वथा वर्जित है। इससे गंभीर बीमारियाँ होने की प्रबल संभावना रहती है।

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कपड़ों और घर में नील (ब्ल) का उपयोग न करें

शास्त्रों में नील को गाय के रक्त के समान माना गया है। सफेदी के लिए टिनोपॉल का उपयोग करें।

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बजरंग बाण का पाठ न करें

इस पाठ में बार-बार हनुमानजी को सीताराम की दुहाई दी गई है, जिससे हनुमानजी को ब्रह्मफाँस लगती है। हनुमानजी के भक्तों को यह पाठ कदापि नहीं करना चाहिए।

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देवता-पूजक हींग का उपयोग न करें

जो व्यक्ति देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, उन्हें हींग का प्रयोग नहीं करना चाहिए — यह देवी भागवत में प्रमाणित है।

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हवन में लोहे के बर्तन न उपयोग करें

लोहे के बर्तन में धूप, दीपक और हवन करने से चुंबकीय शक्ति नष्ट हो जाती है और प्रदूषण बढ़ता है।

वास्तु दोष निवारण

वास्तु शास्त्र के मूल मार्गदर्शन

सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ावा देने के लिए अपने घर की सही व्यवस्था करें।
वायव्य (उत्तर-पश्चिम)
मेहमान कक्ष/
अनाज भंडार
उत्तर
पूजा कक्ष
ईशान (उत्तर-पूर्व)
पानी का हौद / टंकी
पश्चिम
पशु पालन/
शौच स्थान
ब्रह्म स्थान
(खाली / खुला)
पूर्व
मुख्य द्वार
नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)
रसोई घर
मुख्य कक्ष
(मेहमान / बड़े का कमरा)
आग्नेय (दक्षिण-पूर्व)
रसोई
(वैकल्पिक)
दक्षिण

तत्काल उपाय

01
मुख्य द्वार के भीतर और बाहर दोनों ओर गणेशजी की प्रामाणिक मूर्ति/चित्र लगाएँ। गणेशजी की पीठ खोखली न हो — उनकी पीठ में दरिद्रता निवास करती है।
02
मुख्य द्वार के ऊपर पौने सात इंच लंबाई-चौड़ाई का स्वस्तिक बनाएँ — जिसकी प्रत्येक भुजा पौन इंच हो। गाय के घी व सिंदूर से बनाएँ।
03
मुख्य द्वार के बाहर की ओर गाय के घी और सिंदूर से ९७८ लिखें।
04
प्रत्येक कमरे के दरवाजे पर उपाय क्रमांक २ के अनुसार स्वस्तिक बनाएँ।
पितृ शांति

पितर दोष शांति

पितरों को नियमित श्रद्धांजलि देने से जीवन की अदृश्य बाधाएँ दूर होती हैं और परिवार में स्थायी शांति आती है
मासिक

अमावस्या तर्पण

घर के सबसे बड़े सदस्य को प्रत्येक अमावस्या को तर्पण अवश्य करना चाहिए। उत्तर दिशा की ओर मुँह कर, हाथ ऊपर उठाकर तीन पीढ़ियों के पितरों को याद करें और आशीर्वाद की कामना करें।

दैनिक

पीपल वृक्ष को जल

प्रतिदिन (रविवार छोड़कर) पीतल या चाँदी के लोटे में जल, कच्चा दूध, काला तिल, जौ और पुष्प मिलाकर, "ओम विष्णवे नमः" का तीन बार उच्चारण करते हुए पीपल वृक्ष की जड़ में अर्पित करें।

वार्षिक

श्राद्ध पक्ष

श्राद्ध पक्ष के पंद्रह दिनों में पितरों के निमित्त प्रत्येक तिथि पर भोजन अवश्य करवाएँ। सर्वपितृ अमावस्या को सभी पितरों के निमित्त भोजन बनाकर एक आदमी का भोजन पितरों के नाम से जल छोड़कर गाय को खिलाएँ।

घर में तर्पण करने की विधि

एक बड़े पात्र (परात) में पानी, दूध, काला तिल, जौ, पुष्प और कुशा डालें। अँगुलियों में कुशा की अँगूठी पहनकर, प्रत्येक पितर के लिए तीन-तीन अंजलि पानी से भरकर दाहिने हाथ के अँगूठे के पास से छोड़ें। माता-पिता, दादा-दादी और परदादा-परदादी के लिए तर्पण करें।

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